Tuesday, March 13, 2018

बदलते रिश्तें , बिख़रते जज़्बात

Kisi ne sach hi kaha hai: rishto ke roop badalte hai, naye naye saache mein dhalte hai...

Aaj ek udhaaran mila uska...

साथ गुज़ारा हैं हमने वक़्त ऐसा ,
देखें बिना चैन ना आये जैसा ,
ज़िन्दगी की सब हदें करी हैं पार ,
एक दुसरे के लिए किया हैं सब निसार।  

चलते चलते थक जाते थे जब ,
देख उस अपने को निखर जाते थे तब ,
बैठे हुए सुबह से शाम हो जाती थी ,
फिर मिलने की इंतज़ार में मानो , जैसे जान ही चली जाती थी।  

आज लम्हे वो याद आये सारे के सारे , 
जब उसने किया वो सब कुछ किनारे ,
दस सीढ़ियों का फासला ना तय कर पाया वो ,
सूरत देखने पलट के ना आ पाया वो। 

अंजानो की तरह फ़ोन रख दिया ,
जाने बिना ही हाल , काम ख़त्म किया ,
पलों पर लगता है चढ़ गई है धूल , 
प्यार की नज़र ने मान ली है अपनी भूल। 

गुलज़ार साहब की वो पंक्तिया याद आ गई: 

फ़ासलो का अहसास तब हुआ 
जब मैंने कहा... ठीक हूँ 
और 
उसने... 
मान लिया 





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