मैंने कदम भद्धाया, लिए इन होटों पर मुस्कराहट,
अनकहा सा एक रिश्ता,
जिसमें दोनों का रहा हिस्सा।
वक्त गुज़रता गया,
साँसों का कारवां बनता गया,
ज़रूरत, प्यार और प्यार बनी आदत,
आदत की करी उसने खूब वकालत।
मैं उससे जुड़ती गई,
उसके साथ हर कदम चलती गई,
मोहब्बत का जज़बा बढ़ता रहा,
वक्त बेवक्त वो मुझे भूलता रहा।
लिया हर हुकुम सर-आंखों पर,
किया सब कुर्बान उसके dar,
उसका सोचा हर विचार,
किया सच्चा मैंने मेरे यार...
कभी इश्क की एक निगाह उसकी,
कभी तानो की जुबां उसकी,
सितम उसके रहे सदा कबूल,
उन राहो पे चलना है मुझे मंज़ूर।
कटपुतली उसके हाथो की मैं हूँ बनती,
बेखबर समझता नहीं उसके नज़रिए की गलती,
आइना मैं उसका,
पहचान वो मेरी।
करनी तेरी बंध्गी,
मेरा नाम ज़िन्दगी।
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