Tuesday, July 28, 2009

जहाँ मैं ख़तम, वही उनकी शुरुवात

बजी एक धुन सी इस मन में थी,
लगा की पहली बार एक एहसास जागा हैं,
अपनी चाहत की और मैं बढ़ता गया,
बिना कुछ सोचे ख्वाब बुनता गया।

पहली सी अब न वो रातें थी,
सूरज की रौशनी अब जगमगाती थी और
चंदा की चाँदनी दिल लुभाती थी,
मेरी खुशी में शामिल हुआ सारा जहाँ।

शुरुवात थी उनकी पर
अपनी जिंदगी का हिस्सा मैं देता गया,
ज़रूरतें थी उनकी पर
ख़ुद को उनको मैं सौंपता गया,
बिन बोले हर उम्मीद पर उनकी
खरा मैं उतरता गया…


वो अपने लोग छूटे,
यह दुनिया छूती,
पर ना समझ पाया,
जो उनके दिल में था…

वक्त गुजरता रहा,
हर लम्हा मैं आगे बढ़ता रहा,
एक दिन जागा जब नींद से,
बस मैं देखता ही रहा-
उनकी बसी वो नई जिंदगी,
जिसमे मेरे लिए जगह कभी थी ही नही…
जाग जाता अगर ख्वाब से पहले ही,
इस दिल के टुकड़े अभी तक मैं समेटता नाह...

गम पहले से है अब ज्यादा,
पर वो कहाँ समझे मेरा कोई वादा,
हाल उसका ना मुझ सा है,
लम्हे बीतें हुए मैं याद करता हूँ…


शिकवा नहीं उनसे,
ख़ुद से शिकायत है मुझे,
उन्होंने की दिल्लगी,
इस पागल दिल ने उसको दिल-की-लगी बना लिया…

No comments:

Post a Comment